Holika Dahan 2019 Today: जाने कब है होलिका दहन का शुभ मुहूर्त कैसे करें पूजन

जाने होलिका दहन का शुभ महूर्त होली दहन आैर भद्रा काल का गहरा संबंध होता है। इस के अनुसार बुधवार 20 मार्च 2019 को प्रात:काल 10 बज कर 45 से भद्राकाल प्रारंभ हो जायेगा आैर सांयकाल 8 बज कर 59 तक रहेगा।

इंडिया, कोर न्यूज़ टीम नई दिल्ली Last updated: 20 March 2019 | 11:17:00

Holika Dahan 2019 Today: जाने कब है होलिका दहन का शुभ मुहूर्त कैसे करें पूजन

जाने होलिका दहन का शुभ महूर्त
होली दहन आैर भद्रा काल का गहरा संबंध होता है। इस के अनुसार बुधवार 20 मार्च 2019 को प्रात:काल 10 बज कर 45 से भद्राकाल प्रारंभ हो जायेगा आैर सांयकाल 8 बज कर 59 तक रहेगा। इसके बाद 9 बज कर 28 मिनट से रात्रि 11:58 तक होलिका दहन किया जा सकता है। एेसा माना जाता है कि भद्रा में होलिका दहन नहीं किया जाता है। इसीलिए होलिका दहन फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को भद्रा समय के बाद किया जायेगा। सभी लोग अपनी क्षेत्र परंपरा के अनुसार होलिका दहन करेंगे। सामान्य तौर पर भद्रा में होलिका दहन नहीं होना चाहिए क्योंकि एेसा करने से जनसमूह का नाश होता है। प्रतिपदा चतुर्दशी भद्रा और दिन में होलिका जलाना सर्वथा त्याग योग्य समझा जाता है। इसके बावजूद यदि पंडित दीपक पांडे की माने तो उनका कहना है कि इस बार यदि भद्रा लगने के 18 मिनट बाद होलिका दहन किया जाए तो कोर्इ हानि नहीं होगी।

होलिका की पूजन विधि
होलिका दहन शुभ मुहूर्त में पहले पूर्वी आैर फिर पश्चिमी भागों में किया जायेगा। होली की पूजा के लिए रोली, कच्चा सूत, चावल, पुष्प, साबुत हल्दी, बतासे, श्रीफल और बुल्ले आदि इकट्ठा कर ले, और एक थाली में समस्त पूजन सामग्री रख ले। साथ ही एक जल का लोटा भी अवश्‍य रखें। इसके पश्चात होली पूजन के स्थान पर पहुंच करके मंत्र या पूजन करें। सबसे पहले संकल्प लें अपना नाम, पिता का नाम, गोत्र का नाम और चित्र का नाम लेते हुए अक्षत हाथ में उठायें और भगवान गणेश और अंबिका का ध्यान करें और हालिका पर अक्षत अर्पित कर दें। तत्पश्चात भक्त प्रहलाद का नाम ले और पुष्प चढ़ायें। अब भगवान नरसिंह का ध्यान करते हुए पंचोपचार पूजन करें। होली के सम्मुख खड़े हो जाएं और अपने दोनों हाथ जोड़कर मानसिक रूप से समस्त मनोकामनाएं निवेदित करें तत्पश्चात गंध, अक्षत और पुष्प में हल्दी श्रीफल चढ़ायें। कच्चा सूत हाथ में लेकर होलिका पर लपेटते हुए हाथ जोड़कर परिक्रमा करें। अंत में लोटे में भरा जल रही होली का पर चढ़ा दें।पौराणिक आैर सामाजिक है होलिका दहन का महत्व
होलिका दहन का सामाजिक आैर पौराणिक दोनों दृष्टियों से महत्व है, इसे होली के एक दिन पूर्व की सन्ध्या को किया जाता है। होली में जितना महत्व रंगों का है उतना ही होलिका दहन का भी है। एेसी मान्यता है कि इस दिन पूजा करके आप अपनी कोई भी कामना पूरी कर सकते हैं। सामाजिक दृष्टि से कहते हैं कि होलिका की अग्नि में किसी भी बुराई को जलाकर खाक कर सकते हैं। होलिका दहन या होली भारत के उत्तरी भागों में मनाये जाने वाला प्मुख त्यौहार है। होलिका दहन को हम छोटी होली भी कहते हैं। पूर्णिमा से पूर्व फाल्गुन माह में शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को होलिका दहन होता है। इसके साथ प्रमुख रूप से जुड़ी कथा के अनुसार वर्षो पूर्व पृथ्वी पर एक अत्याचारी राजा हिरण्यकश्यप राज करता था। उसने अपनी प्रजा को आदेश दिया कि सभी ईश्वर की अराधना ना करके उसे ही अपना आराध्य माने। जबकि उसका पुत्र प्रहलाद ईश्वर का परम भक्त था। उसने अपने पिता की आज्ञा की अवहेलना करते हुए अपनी ईश भक्ति जारी रखी। तब हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र को दंड देने के लिए अपनी अग्नि से ना जलने का वरदान प्राप्त कर चुकी बहन होलिका की गोद में प्रहलाद को बिठा कर अग्नि के हवाले कर दिया। इसके बाद भी दुराचारी का साथ देने के कारण होलिका भस्म हो गई और भक्त प्रहलाद की भगवान ने रक्षा कर ली। तभी से हम बुराइयों आैर पाप के अंत के रूप में होलिका दहन करते आ रहे हैं।शास्त्रों के अनुसार होली में रंग खेलने से पहले बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक अग्नि की पूजा की जाती है। भुना हुआ धान्य या अनाज संस्कृत में होलका कहलाता है, इसी के चलते होलिका शब्द होलका यानी अनाज से उत्पन्न हुआ है। इसी अनाज से हवन किया जाता है, आैर उसकी राख से तिलक किया जाता है, ताकि अन्न पर कोई बुरा साया ना पड़े। होलिका दहन की तैयारी त्योहार से 40 दिन पहले शुरू हो जाती हैं। जिसके लिए सार्वजनिक स्थानों आैर चौराहों पर सूखी टहनियां, सूखे पत्ते इकट्ठा करते हैं, फिर फाल्गुन पूर्णिमा की पूर्व संध्या को अग्नि जलाई जाती है और रक्षोगण के मंत्रो का उच्चारण किया जाता है।

 

 

 

credit by: jagran 

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