जज लोया की मौत की जांच याचिका खारिज, बीजेपी कॉंग्रेस में आरोप प्रत्यारोप जारी

न्यायालय ने कहा कि इन याचिकाओं से यह साफ हो जाता है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सीधा हमला करने का हकीकत में प्रयास किया गया और मौजूदा मामला व्यक्तिगत एजेन्डे को आगे बढ़ाने की मंशा जाहिर करता है।

इंडिया, कोर न्यूज़ टीम डेस्क Last updated: 20 April 2018 | 08:16:00

जज लोया की मौत की जांच याचिका खारिज, बीजेपी कॉंग्रेस में आरोप प्रत्यारोप जारी

सुप्रीम कोर्ट ने सोहराबुद्दीन शेख फर्जी मुठभेड़ मामले की सुनवाई करने वाले विशेष जज बी एच लोया की संदिग्ध परिस्थितियों हुई मृत्यु की स्वतंत्र जांच की मांग करने वाली याचिकाएं यह कहते हुए खारिज कर दीं कि जज की स्वाभाविक मृत्यु हुयी थी। शीर्ष अदालत का फैसला आने के साथ ही भाजपा और कांग्रेस के बीच आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गया। न्यायालय ने कहा कि इन याचिकाओं से यह साफ हो जाता है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सीधा हमला करने का हकीकत में प्रयास किया गया और मौजूदा मामला व्यक्तिगत एजेन्डे को आगे बढ़ाने की मंशा जाहिर करता है।


चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस ए एम खानविलकर और जस्टिस धनन्जय वाई चन्द्रचूड़ की तीन सदस्यीय खंडपीठ ने कहा कि जज लोया की मृत्यु को लेकर याचिकायें प्रतिद्वंद्वियों के इशारे पर राजनीतिक हिसाब बराबर करने के इरादे से दायर की गई थीं। याचिकाओं में जज लोया की जिन परिस्थतियों में मौत हुई थी उसको लेकर संदेह जताया गया था।


जज लोया मृत्यु से पहले सोहराबुद्दीन शेख फर्जी मुठभेड़ मामले में मुकदमा चला रहे थे। एक दिसंबर, 2014 को नागपुर में उनकी मृत्यु हो गई थी। वह वहां अपने एक सहयोगी की पुत्री के विवाह में शामिल होने गये थे। आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार उनकी मृत्यु दिल का दौरा पड़ने के कारण हुई थी। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह सोहराबुद्दीन शेख फर्जी मुठभेड़ मामले में आरोपी थे। हालांकि, उन्हें बाद में आरोप मुक्त कर दिया गया था। शाह मुठभेड़ के समय गुजरात के गृह राज्यमंत्री थे।

जज लोया की मृत्यु का मामला पिछले साल नवंबर में उस समय चर्चा में आया जब मीडिया में उनकी बहन के उनकी मृत्यु की परिस्थितियों पर संदेह जताने की खबरें आयीं और इसे सोहराबुद्दीन मामले से जोड़ा गया। शीर्ष अदालत ने अपने 114 पन्नों के फैसले में कहा कि जज लोया के निधन से संबंधित परिस्थितियों को लेकर दायर सारे मुकदमे इस फैसले के साथ समाप्त हो गये। कांग्रेस नेता तहसीन पूनावाला और महाराष्ट्र के पत्रकार बी एस लोन द्वारा दायर याचिकाओं समेत इस मामले की स्वतंत्र जांच की मांग को लेकर कुल पांच याचिकाएं दायर की गई थीं।

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, ‘‘रिकॉर्ड में उपलब्ध दस्तावेजी सामग्री इस बात का संकेत देते हैं कि जज लोया की मृत्यु स्वाभाविक कारणों की वजह से हुई थी। अदालत के लिये यह कहने का कोई आधार नहीं है कि मृत्यु के कारणों या परिस्थितियों के बारे में तर्कसंगत संदेह था, जिससे आगे जांच कराने की जरूरत है।’’ शीर्ष अदालत ने कहा कि जज लोया की मृत्यु को लेकर दायर सारी जनहित याचिकायें ओछी और प्रायोजित थीं जो राजनीतिक हिसाब बराबर करने के इरादे से दायर की गई थीं तथा न्यायिक अधिकारियों और बंबई उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की गरिमा को ठेस पहुंचाने के लिये प्रतिद्वन्द्विता ही इन याचिकाओं का मुखौटा थीं।

शीर्ष अदालत ने कहा कि यदि असंगत कारणों के साथ इस तरह के मुकदमों का बोझ अदालतों पर डाला गया तो न्यायिक प्रक्रिया एक पहेली बनकर रह जायेगी। शीर्ष अदालत ने न्यायिक अधिकारियों और न्यायाधीशों पर आक्षेप लगाने के लिये याचिकाकर्ताओं और उनके वकीलों की आलोचना की। न्यायालय ने कहा कि उनके खिलाफ दुराग्रह पैदा करने का प्रयास किया गया और यह न्यायपालिका पर अपमानजनक हमला था। न्यायालय ने कहा कि उसने याचिकाकर्ताओं के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के बारे में सोचा लेकिन बाद में ऐसा नहीं करने का निश्चय किया।

पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने न्यायपालिका की छवि धूमिल करने का परोक्ष रूप से प्रयास किया और न्यायिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए। पीठ ने शीर्ष अदालत समेत न्यायाधीशों पर आक्षेप लगाने के लिये वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे, इंदिरा जयसिंह और प्रशांत भूषण की आलोचना की।

पीठ की ओर फैसला लिखने वाले न्यायमूर्ति चन्द्रचूड़़ ने कहा, ‘‘व्यापारिक प्रतिद्वंद्विता का हल बाजार में निकालना होगा जबकि राजनैतिक प्रतिद्वंद्विता का समाधान लोकतंत्र के अखाड़े में करना होगा। कानून की रक्षा करना न्यायालय का कर्तव्य है।’’

जज लोया के निधन से संबंधित विवरण के बारे में चार जजों-श्रीकांत कुलकर्णी और एस एम मोदक, वी सी बार्डे और रूपेश राठी- के बयानों पर भरोसा करते हुये शीर्ष अदालत ने कहा, ‘‘उनके बयानों की सच्चाई पर संदेह करने की कोई वजह नहीं है।’’ पीठ ने कहा कि इन चार जजों के बयान भरोसेमंद, सुसंगत और सच्चाई से परिपूर्ण हैं और इन पर अविश्वास करने का कोई कारण नहीं है।

फैसला आने के बाद भाजपा ने कांग्रेस पर जोरदार हमला बोल दिया। भाजपा ने आरोप लगाया कि ‘अमित शाह का राजनैतिक करियर समाप्त करने की साजिश के तहत’ याचिकाओं के पीछे ‘अदृश्य हाथ’ राहुल गांधी का था। भाजपा के कई नेताओं ने कांग्रेस और राहुल पर हमला बोला और उनसे माफी मांगने को कहा। उन्होंने इसे राजनैतिक लड़ाई के लिये न्यायपालिका के इस्तेमाल का प्रयास बताया, जिसका लक्ष्य शाह का ‘चरित्र हनन’ करना था।

उच्चतम न्यायालय के फैसले से असहमति जताते हुए कांग्रेस ने ‘अनुत्तरित सवालों’ के जवाब पाने के लिये निष्पक्ष जांच की मांग की। कांग्रेस ने भाजपा पर शीर्ष अदालत के आदेश की गलत व्याख्या करके राजनैतिक लाभ लेने का आरोप लगाया। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह पर निशाना साधा। उन्होंने कहा, ‘‘उनके जैसे लोगों को बेनकाब करने का सच का अपना तरीका है।’’ कांग्रेस के मीडिया विभाग के प्रमुख रणदीप सुरजेवाला ने संवाददाताओं से कहा, ‘‘उच्चतम न्यायालय की निगरानी में स्वतंत्र जांच के बाद न्यायाधीश लोया की मौत का सच एक दिन सकारात्मक रूप से सामने आ जाएगा।’’

अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने इस फैसले को न्यायपालिका के लिये ‘काला दिन’ करार दिया। वहीं, जाने-माने विधिवेत्ता सोली सोराबजी ने कहा कि याचिकाओं का खारिज किया जाना उन लोगों के लिये चेतावनी है जो सिर्फ प्रचार पाने के लिये बिना ठोस सामग्री के इस तरह की याचिकाएं दायर करते हैं।वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने सोराबजी के विचारों से सहमति जताते हुए कहा कि जनहित याचिकाओं पर ‘सख्त फैसला’दिया गया है। ये याचिकाएं राजनीति से प्रेरित थीं। कांग्रेस नेता तहसीन पूनावाला ने कहा कि वह फैसले से बेहद निराश हैं। उनका मानना है कि अदालत मामले के गुण-दोष में नहीं गई। पूनावाला इस मामले में याचिकाकर्ता भी थे। 




 news courtesy - khabarindiatv

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